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By समाचार नाऊ ब्यूरो | Publish Date: Mon ,19 Jun 2017 06:06:37 pm |
नयी दिल्ली : भाजपा द्वारा राष्ट्रपति चुनाव में दलित उम्मीदवार के रूप में बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद के नाम के एलान पर ज्यादातर विपक्षी दलों ने जहां सधी प्रतिक्रिया दी है, वहीं वाम दलों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त कर दी है. माकपा महासचिव सीताराम येचुरी के बयानों से साफ तौर यह आभाष हो रहा है भाजपा के दलित उम्मीदवार के नाम से विपक्ष पर दबाव बन गया है और ऐसे में वे अभी से यह जोर दे रहे हैं कि 22 को विपक्षी दलों की बैठक में जरूर उम्मीदवार का नाम तय किया जाये. उन्होंने यह तक संदर्भ दिया कि नीलम संजीव रेड्डी के अलावा हमेशा पक्ष-विपक्ष के मुकाबले से राष्ट्रपति चुना जाता रहा है और चुनाव की ही परंपरा इस सर्वोच्च पद के लिए रही है.
वहीं, दूसरी बड़ी पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सुरावरम सुधाकर रेड्डी ने कहा कि रामनाथ कोविंद संघ से हैं, एेसे में विपक्ष को जरूर अपना उम्मीदवार उतारना चाहिए. कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सुरावरम सुधाकर रेड्डी ने कहा, ' 'कोविंद भी संघ से हैं. वह भाजपा के दलित मोर्चा के अध्यक्ष रहे हैं जो कि संघ परिवार का संगठन है. निश्चित रूप से हम उम्मीदवार खड़ा करेंगे. संघ से चाहे कोई भी हो ........ हम मुकाबला करेंगे. ' '
हिंदुस्तान में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का सबसे मजबूत वैचारिक विरोधी हमेशा से वामपंथी रहे हैं, भले ही उनका राजनीतिक आधार राष्ट्रव्यापी नहीं रहा हो. और, आज कोविंद की उम्मीदवारी के उनके तीखे विरोध से यह तो स्पष्ट हो गया है कि वे देश के सर्वोच्च पद पर पहले भाजपा-संघ पृष्ठभूमि वाले शख्स के पहुंचाने को लेकर चिंतित हैं. भाजपा के खुद के नेतृत्व में दूसरी बार केंद्र में सरकार बनी है. वाजपेयी जी के कार्यकाल में मुलायम-अमर की राजनीति की वजह से भाजपा को वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति चुनना पड़ा. अपने विराट व्यक्तित्व के कारण कलाम सर्वस्वीकार्य थे, लेकिन वे संघ-भाजपा की पृष्ठभूमि से नहीं थे.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हमेशा यह चाह रही है कि हर अहम पद पर उसकी विचारधारा के लोग बैठें. पेशे से वकील कोविंद ने मोरारजी देसाई के निजी सचिव के रूप में काम किया था और इसके बाद ही वे संघ-भाजपा नेतृत्व के संपर्क में आये और उसकी विचारधारा में रच-बस ही नहीं गये, बल्कि उसे व्याख्यायित करने वाले एक प्रमुख दलित चेहरा बन गये. 1990 में जब उन्हें पार्टी ने लोकसभा चुनाव में उतारा तो भले वे हार गये, लेकिन पार्टी के लिए उनकी अहमियत कम नहीं हुई अौर वे राज्यसभा भेजे गये, साथ ही संगठन की सीढ़ियां भी लगातार चढ़ते रहे और आर राष्ट्रपति भवन के दरवाजे तक पहुंच गये हैं.
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