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By समाचार नाऊ ब्यूरो | Publish Date: Sun ,19 Mar 2017 05:03:02 pm |
समाचार नाऊ ब्यूरो - उत्तर प्रदेश में योगी आदित्य नाथ के सीएम की गददी पर बैठने के बाद मोदी योगी की सियासत पर एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है देश में भटकती राजनीति और अच्छे लोगों की राजनीति में ना आने की एक बड़ी वजह है राजनीतिक दलों का प्राइवेट लिमिटेड कंपनी हो जाना माना जा रहा है बाप की सल्तनत सत्ता में सियासत की विरासत राजनैतिक दलों के लिए बड़ा सीधा फार्मूला है जहां पर कार्यकर्ता यह सोचकर हतोत्साहित हो जाता है यहां उसके लिए नीति बनाने जैसा कुछ नहीं है।
जीवन खत्म हो गया है शायद कोई नियति ऐसी हो जाए तो पार्टी में उसे कोई तवज्जो मिल जाए यह कोई एक पार्टी की बात नहीं है दस जनपथ की सल्तनत के वर्तमान कर्ताधर्ता की बात करें या फिर ज्योतिरादित्य सिंधिया और राजेश पायलट की क्षेत्रीय पार्टियों की बात करें तो बात चैधरी चरण सिंह के बेटे की हो या फिर कांशीराम के उत्तराधिकारी मायावती की मुलायम के बेटे अखिलेश की बात हो या फिर हेमंत सोरेन और शिबू सोरेन की रामविलास पासवान लालू यादव की बात हो या फिर जयललिता के कुर्सी के लिए मचे घमासान और उसके उत्तराधिकारी की सियासत कभी कार्यकर्ताओं की सोच के लिए पार्टी के मुखिया की मुखर हुई ही नहीं बात की करें तो मोदी से लेकर योगी तक जिस तरीके की सत्ता के शिखर को पाए हैं उससे एक बात तो साफ है कि बीजेपी ही एक ऐसी पार्टी है जहां कार्यकर्ता कब कर्ताधर्ता बन जाए कहना मुश्किल है।
यह भजापा की नीति का बखान नहीं बल्कि सियासत में बनते नए कार्यकर्ता के उस समीकरण का है जिसमें राजनीति की बात करते ही कार्यकर्ता यह कह कर थक जाता है कि उसके लिए जगह बना पाना बहुत आसान नहीं है कारण भी बहुत साफ है कि जिन लोगों ने कांग्रेस को खून पसीना देकर सींचा वह लोग आज राहुल की निगहबानी का इंतजार कर रहे हैं अमर सिंह और मुलायम सिंह ने जिस तरीके से सपा को खड़ा किया है वह अभी अखिलेश के अंश का ही इंतजार है मायावती अकेले ही निर्णय लेती हैं ऐसे में और किसी का कुछ चलता नहीं रामविलास केंद्र की सत्ता में है गठबंधन के लिए बेटे ने ही कहा था बिहार की सत्ता में लालू जब थे और उनके अच्छे दिन नहीं थे तब भी जो लोग उनके साथ हैं आज उन्हें राजनीति की समझ बताई जा रही है।
यह तमाम चीजें वैसे नेताओं के लिए वैसे युवाओं के लिए जो सामाजिक क्षेत्र में आ करके कुछ बदलाव की बात करते हैं उनकी पूरी सोच ही थक जाती उत्तर प्रदेश का प्रचंड जनमत शायद इस विषय को लेकर के एक नई बहस को जन्म तो दे ही दिया है कि क्या कार्यकर्ताओं को तरजीह देना ऐसे राजनीतिक दलों के गर्त में जाने का कारण बना है विचार तो यह राजनैतिक दल जरुर करेंगे क्यों किसी भी पार्टी की सबसे बड़ी पूंजी उसके कार्यकर्ता ही होते हैं और नीति भी उन्हीं के लिए बनती है लेकिन सल्तनत की विरासत जिस तरह से कुछ दिनों तक सत्ता पर काबिज रही है और आज जिस तरीके से हट गई है उससे एक बात तो साफ है की बाकी राजनीतिक दलों के लिए यह चिंता का विषय है लेकिन बीजेपी के लिए जिस उद्भव का प्रादुर्भाव हुआ है उसमें कम से कम कार्यकर्ता तो यह कहेगी रहा है कि नया सूरज उगा है देश बदल रहा है
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