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मजाक न बनें लोकतंत्र में जनता के आस्था का मंदिर- तेजस्वी यादव

By समाचार नाऊ ब्यूरो | Publish Date: Tue ,07 Mar 2017 01:03:31 pm | Updated Date: Tue ,07 Mar 2017 06:03:12 pm


समाचार नाऊ ब्यूरो - बिहार विधान सभा में लगातार हो रहें हंगामें कारण स्थगित हो रहे सदन को लेकर उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने कहा कि  लोकतंत्र अर्थात लोक या लोगों का तंत्र, जनता के हितों के लिए स्थापित तंत्र। वह व्यवस्था जिसमें जनता का हित ही पहला और अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। अगर लोकतंत्र एक धर्म है, जो कि वह सचमुच है, तो संविधान उसका धर्मग्रंथ है और देश के राज्यों की विधानसभाएं और दिल्ली में संसद उसके मंदिर। जब सब कुछ जनता के इर्द गिर्द ही घूमती हो तो लोकतंत्र के इस धर्म में जनता के अलावा भला और किसे भगवान का स्थान दिया जा सकता है? 

पर जो जनप्रतिनिधि यह समझने लगे कि यह सारी व्यवस्था उसके या उनके लिए ही है तो वह जनता से कटता चला जाएगा। कुछ ऐसा ही हाल हमारे राज्य के भाजपा नेताओं के बारे में कहा जा सकता है। विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद उन्हें यह अहसास हो जाना चाहिए था कि जनता उन्हें अपने से कटा हुआ समझ रही है। परंतु उनका हाल का आचरण इस प्रकार का नहीं है जो यह सुझाए कि वे इस लिहाज से कुछ सुधार के इच्छुक हों।

सरकार के एक मंत्री महोदय द्वारा प्रधानमंत्री के संदर्भ में अनुचित बयान को लेकर लगातार विधानसभा की कार्यवाही को बाधित करना कितना सही है? वह भी तब जब मंत्री महोदय माफ़ी माँग चुके हों? भले ही हमारे प्रधानमंत्री का आचरण उस प्रकार का ना प्रतीत हो, पर एक प्रधानमंत्री समस्त राष्ट्र का प्रधानमंत्री होता है, किसी दल, प्रान्त या समुदाय विशेष का नहीं। प्रधानमंत्री के बयानों की फेहरिश्त तैयार की जाए तो बिलकुल ऐसा प्रतीत नहीं होगा कि यह भारत जैसी विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहर और सामाजिक, धार्मिक, जातीय व प्रांतीय विविधताओं वाले देश के प्रधानमंत्री के बयान हैं। भले प्रधानमंत्री अपनी गरिमा भूल जाएँ पर माननीय मंत्री जी को अपनी मर्यादा का ख्याल रखना चाहिए था। यह काबिल ए तारीफ़ है कि उन्हें अपनी गलती का अहसास होते ही तुरन्त माफ़ी माँग ली।

एक कहावत है- छीलते छीलते बाँस खत्म हो जाता है, बात नहीं। बात को जितना आगे बढ़ाया जाएगा, वह बढ़ेगा। दाव पर तो यहाँ जनता का हित, समय और पैसा लगा हुआ है और उससे भला भाजपा के नेताओं को क्या? उन्हें तो बस हंगामा बरपा कर सदन का समय बर्बाद कर अपनी उपस्थिति का अहसास मात्र करवाना है। जनता से जुड़े मुद्दे सदन में उठाने की उनमें कोई रूचि नहीं है। विवाद को नया नया रूप देकर इसे अधिक से अधिक खींचने का अनुचित प्रयास किया जा रहा है। अब प्रतिपक्ष नेता ने विधानसभा अध्यक्ष महोदय को भी विवाद में लपेटने का अशोभनीय प्रयास किया है।

भाजपा विधायक लाल बाबू गुप्ता ने राजद विधायक फ़राज़ फातमी से इतनी आपत्तिजनक और भद्दी भाषा का प्रयोग किया  जिसका सार्वजनिक जीवन में ज़िक्र तक नहीं किया जा सकता। सदन के गरिमामयी इतिहास में आजतक शायद इतनी तुच्छ भाषा का प्रयोग नहीं किया गया है। अगर सचमुच भाजपा सदन की गरिमा और राजनीति में उत्कृष्ट व्यवहार की हिमायती है तो तुरंत इस अभद्रता का संज्ञान लेते हुए अपने विधायक को तुरन्त बर्खास्त करे, वर्ना यह 'प्रधानमंत्री के अपमान' का बहाना लेकर बिहार की जनता का धन व समय बर्बाद करने का उन्हें कोई नैतिक अधिकार नहीं है। भाजपा के विधायक का यह कृत्य जानबूझ कर संयम और धैर्य से खेलने वाला षड्यंत्र था। 

यह सब जानते हैं कि महागठबन्धन के विधायकों की औसत आयु विपक्ष के विधायकों से कम है। औसतन युवा होने के बावजूद हम धैर्यवान हैं, परिपक्व हैं। जनता की उम्मीदों व आकांक्षाओं से और उनके प्रति अपनी जिम्मेदारियों से परिचित हैं। छिछली राजनीति में हम विश्वास नहीं करते। सकारात्मक राजनीति करते हुए सदन तक आए हैं, और यही करते हुए प्रदेश की जनता के जनजीवन पर सकारात्मक प्रभाव छोड़ने को संकल्पित हैं। उम्मीद है भाजपा हमसे कुछ सीख लेगी, क्योंकि यह उनके हित में भी है। वर्ना जनता तो देख ही रही है, चार वर्षों के पश्चात उन्हें पुनः देख लेगी।



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