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By ?????? ??? ?????? | Publish Date: Sat ,05 Nov 2016 07:11:05 am |
संथाल समाज से बहिष्कृत हुई "बुधनी"
पंडित नेहरू से विवाह होने का था उसपे आरोप
बुधनी ने पंडित नेहरू के साथ किया था मंच साझा
आदिवासी संथाल समाज बुधनी को मानते हैं नेहरू परिवार की सदस्या-
आजतक विधिवत विवाह भी नही कर पायी बुधनी-
देश के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ मंच साझा करने पर ताजिंदगी सजा भुगतनी होगी, इस बात का अंदाजा झारखण्ड के धनबाद में रहने वाली संथाली आदिवासी महिला बुधनी मझियाइन् को कतई नही था । दरअसल पंडित नेहरू ने दामोदर घाटी निगम के पंचेत डैम में काम करने वाली महिला मजदूर बुधनी मझियाइन् के हाथों ही डैम का उद्घाटन कराया था । कार्यक्रम के दौरान मंच पर पंडित नेहरू को माला पहनाने और हाथ मिलाने की सजा बुधनी को उसके समाज के लोगो ने दे डाली । आदिवासी संथाल समाज के ठेकेदारो ने बुधनी का गैर आदिवासी पंडित नेहरू से विवाह होने (माला पहनाये जाने पर) और बुधनी का नेहरू परिवार का सदस्य होने का फरमान जारी कर बुधनी का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया । जिंदगी का 80 सावन देख चुकी बुधनी इसके बाद विधिवत विवाह भी नही कर सकी । प्रोजेक्ट का उद्घाटन कर चर्चा में आई बुधनी "न राम मिली न माया" वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए जिंदगी गुजार रही है।
दिसम्बर 1959 के दिन बुधनी का सर ऊँचा था। देश के प्रधानमन्त्री के साथ मंच साझा करते हुए बुधनी के हाथो पंचेत डैम का उद्घाटन हुआ था । पंडित नेहरू ने एक महिला मजदूर के हाथो डैम का उद्घाटन करा एक इतिहास रच डाला था, किसे पता था इसके साथ एक और इतिहास की पृष्ठ भूमि तैयार हो रही है । कार्यक्रम समाप्त होने के बाद इसी तारीख की काली रात बुधनी की जिंदगी पर एक ग्रहण के रूप में लगा गया । धनबाद के "खोरबोना" गांव में उसी रात आदिवासी संथाल समाज की बैठक हुई। बुधनी के एक गैर आदिवासी पुरुष को माला पहनाये जाने और हाथ मिलाने की सजा का फरमान जारी हुआ। बुधनी का परिवार, समाज, रिश्तेदारी से बहिष्कार किये जाने का फरमान बुधनी की जिंदगी में भूचाल ला दिया। संथाल की रीति के मुताबिक समाज की कुवांरी लड़की अगर किसी गैर पुरुष को माला पहनाती है या उसका हाथ पकड़ती है, तो वह उसका पति हो जाता है। इस अन्धविश्वास की शिकार बुधनी बन गयी । गुजरते समय के साथ बुधनी एक पुरुष के संसर्ग में आई भी, उससे इनके संतान भी हैं, लेकिन बुधनी विधिवत वैवाहिक जीवन नही जी सकी। आज बुधनी काफी आक्रोश में है । उसे नेहरू अब गांधी परिवार से अपने लिए एक मकान और बेटा को नौकरी चाहिए ।उस वक्त देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और बुधनी मंझियाइन साथ मंच साझा करने वालो में यही के रहने वाले रावोण मांझी ने उस वक्त की सारी कहानी बयान करते हुवे कहते है कि इस घटना से आज तक उसका दर्द झेल रही बुधनी मंझियाइन तो दरबदर की ठोकरे खाने को तो विवस है ही, नेहरू जी ने जो यहा के आम लोगो से वादा किया था जिसमे मुफ़्त बिजली मिलेगी, घर बनेगा कुछ भी पूरा नहीं हुआ ।
6 दिसंबर 1959 को बुधनी महज 15 साल की थी, अपने इस उम्र में उसने पुरे जोश के साथ पंचेत पहुंचने पर बुधनी मंझि आईन ने पंडित जवाहर लाल नेहरू का पुरे पारंपरिक तरीक़े से स्वागत किया । उन्हें माला पहनाई गई, चंदन लगाकर आरती उतारी गई, प्रधानमंत्री नेहरू ने पंचेत बांध का उद्घाटन बुधनी से ही कराया । दरअसल वे चाहते थे कि बांध के निर्माण में लगा मज़दूर ही इसका उद्घाटन करे । बुधनी मंझिआईन भारत की शायद पहली मज़दूर होंगी, जिनके हाथों किसी परियोजना का उद्घाटन कराया गया । लेकिन इसका दंश आज भी उसका परिवार झेल रहा है । बुधनी के छोटे बेटे कि माने तो आज भी गाव वाले उन्हें नेहरू खानदान के होने का ताना मारते है । इतने साल बीत जाने के बावजूद ये अपने समाज में अपना सर उठा कर नहीं चल पाते है । इसके बावजूद वो नेहरू के वंसज सोनिया गांधी और राहुल गांधी से इतने दुखो के बदले एक घर और एक नौकरी की मांग कर रहे है, ताकि उनकी बाकी की जन्दगी शान्ति से कट सके ।
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